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कैसे खत्म करें बच्चों की झिझक-2-ब्लडप्रेशर को हल्के में न लें-3-कॉफी पीते हैं नुकसान और फायदे

कैसे खत्म करेंबच्चों की झिझक-

बचपन सीखने-समझने और चीजों को एक्सप्लोर करने का सबसे अच्छा दौर होता है। एक इंसान अपनी पूरी लाइफ में जितना सीख पाता है, उसका 50% अपने बचपन में सीखता है। लेकिन, कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं, जो बहुत कम बोलते हैं। वे इंट्रोवर्ट हो जाते हैं। वे अपने मन की बात को दिल में ही रखते हैं। दुनिया में हर 10 में से 1 बच्चा अपनी भावनाओं, जरूरतों और समस्याओं को किसी से साझा करने में झिझक महसूस करता है।

यह एक बड़ी समस्या है, उम्र के साथ जब मानसिक दबाव बढ़ता है तो भी ऐसे लोग अपनी बात को किसी से साझा नहीं कर पाते। कई टीनएजर डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। बच्चों को फ्रैंक बनाने और झिझक खत्म करने में पैरेंट्स की भूमिका सबसे अहम होती है। अगर आपका बच्चा खुलकर अपनी भावनाओं को साझा नहीं कर पा रहा है तो आप उसे ज्यादा बोलने के लिए प्रेरित करें।

इमोशनल इंटेलिजेंस एंड सोशल इंटेलिजेंस किताब के राइटर डेनियल गोलेमन के मुताबिक, 'अपने बच्चों में कोई भी पॉजिटिव चेंज देखने के लिए पैरेंट्स के तौर पर आपको सबसे पहले उनकी फीलिंग्स को समझना होगा।'

पहले यह जानें कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं?

  • फैमिली थेरेपिस्ट लेनाया स्मिथ कहती हैं कि 'मैं फैमिली सेशन से पहले लोगों का फीलिंग चेक करना शुरू कर देती हूं। मैं ये जानना चाहती हूं कि पूरे हफ्ते हमारे क्लाइंट्स का अनुभव कैसा रहा है। उसने कैसा महसूस किया।'
  • लेनाया स्मिथ बताती हैं कि 'पैरेंट्स को भी अपने बच्चों की फीलिंग चेक करनी चाहिए। ऐसा रोज करना चाहिए और आप इसे तब-तक कर सकते हैं, जबतक कि आपके बच्चे बड़े न हो जाएं।'
  • राइटर डेनियल गोलेमन के मुताबिक, 'सेल्फ अवेयरनेस भी बहुत जरूरी है। जैसे- आप कैसा महसूस कर रहे हैं और क्यों? यह हमारी फीलिंग का सबसे जरूरी एलिमेंट होता है। इसलिए इस बारे में जानकारी रखना हमारे लिए जरूरी होता है। बिना इस एलिमेंट को ढूंढ़े हम अपनी फीलिंग्स को कंट्रोल नहीं कर सकते।'
  • हमारे रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे कई मौके आते हैं, जब हमें अपनी फीलिंग्स को कंट्रोल करना पड़ता है। आप अपने बच्चे में यदि बदलाव लाना चाहते हैं तो सबसे पहले उसकी फीलिंग्स को समझना होगा।'

बच्चों को सिखाएं कि कैसे शांत रहें

  • डॉ. गोलेमन के मुताबिक बच्चों को यह बताना कि कैसे शांत रहा जाए बहुत जरूरी है। उनको हमेशा बताइए कि अपने लक्ष्य पर फोकस करें और असफल होने के बाद भी उम्मीद न छोड़ें।
  • गोलेमन कहते हैं, “जब मेरी बेटी परेशान होती है और खुद की समस्या को बताने की कोशिश करती है तो मैं उससे कहता हूं कि बोलने से पहले वो एक लंबी सांस ले। जब हम किसी गंभीर मुद्दे पर बात करते हैं तो उस वक्त कुछ और नहीं करते। पहले कुछ देर शांत रहते हैं फिर बातें करते हैं। छोटे बच्चों में इमोशन को मैनेज करने की क्षमता होती है।'
  • बच्चों को किसी अच्छे खुले मैदान या पार्क में ले जाएं, उन्हें वहां घास पर लेटने को कहें और फिर सांस लेते और छोड़ते हुए उनकी कमर को ऊपर नीचे करने में मदद करें। यह एक एक्सरसाइज है, जिससे बच्चे इमोशनली मजबूत होते हैं।
  • जब बच्चे शांत हो जाएं तो आप उनसे बात करने का प्रयास करें। लेकिन, एक बात का ध्यान रखें कि खुद कम बोलें और बच्चे को ज्यादा बोलने के लिए प्रेरित करें। ऐसा करने से कम बोलने वाले बच्चे भी अपनी भावनाओं को साझा करना सीख जाएंगे।

बच्चों को लेकर पैरेंट्स अपनी लिमिट तय करें

  • अमेरिकी महिला क्विकी कहती हैं कि बच्चों के साथ एक लिमिट सेट करना जरूरी होता है। इससे आप बच्चों के ऊपर जरूरत से ज्यादा रिएक्ट नहीं कर पाएंगे। यहां एक ऐसी बाउंड्री हो, जिसमें आपकी रिएक्शन कैद हो न कि बच्चे के साथ कम्यूनिकेशन गैप हो।
  • क्विकी कहती हैं इस तरह की एक आदर्श सीमा बनाने से आपका बच्चा आपसे खुल कर बोल पाएगा। अपनी हर छोटी बड़ी समस्या को साझा कार पाएगा। छोटे बच्चों के लिए यह बहुत जरूरी है कि उनकी अप-ब्रिंगिंग इस तरह से हो कि वे बोलना और अपनी भावनाओं को साझा करना सीख सकें।

बच्चों की भावनाओं को पहचानें

  • लेनाया स्मिथ कहती हैं कि, “अगर आपका बच्चा रो रहा है तो उनसे कुछ सीधे सवाल पूछें। जैसे- उसे क्या महसूस हो रहा है, उसके साथ जो कुछ भी हुआ वो कैसे हुआ। कई बार बच्चे अपने भावनाओं को दुखी होकर या गुस्से में भी व्यक्त करते हैं।”
  • स्मिथ कहती हैं, “मैंने अपनी बेटी से कई बार कहा की वो सोने के समय रात के कपड़े पहन लिया करे। मैंने दो बार गुस्से में भी उसे बोला। इसके चलते बेटी दुखी हो गई, इसके बावजूद वो हमेशा मुझसे कहती कि मैं आपको दुखी नहीं करना चाहती।”
  • स्मिथ के मुताबिक, हमें अपने बच्चों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। अगर हम उन्हें लगातार गुस्सा दिलाते हैं या दुखी करते हैं तो वे अपनी बातों को खुलकर कभी नहीं रख पाएंगे। हमें बच्चों की भावनाओं को पहचाना चाहिए और उसी के हिसाब से व्यवहार करना चाहिए।

बच्चों को भावनाएं लिखने के लिए प्रेरित करें

  • कभी-कभी स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि बच्चे बता ही नहीं पाते कि वो क्या महसूस कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में पैरेंट्स को बच्चे को प्रेरित करना चाहिए कि वो अपनी भावनाओं को लिखकर बताएं कि कैसा महसूस कर रहे हैं।
  • स्मिथ कहती हैं कि वो और उनकी बेटी एक डायरी रखती हैं, जिसके जरिये दोनों एक-दूसरे से रोज की कुछ बातें साझा करती हैं। इसलिए माफी मांगने जैसी स्थिति में लिखकर अपनी भावनाओं को साझा करना बहुत ही कारगर तरीका है। हम वह सबकुछ साझा कर सकते हैं, जो आमतौर पर हम बोल नहीं सकते। बच्चों को हर चीज के लिए वोकल बनाने के लिए भी यह अच्छा तरीका है। इसके लिए बच्चों को प्रेरित करना जरूरी होता है।
  • अगर आपका बच्चा बोलने में घबरा रहा है तो अभी देर नहीं हुई है। उसे आप लिखकर अपनी भावनाओं को बताने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
  • -ब्लडप्रेशर को हल्के में न लें--
  • क्या आप को लगता है कि आप का ब्लडप्रेशर नॉर्मल है? आप फिर से सोचिए। एक आइडियल ब्लडप्रेशर सिस्टोलिक प्रेशर के पारे का 120 मिलीमीटर होता है। यानी जब हमारा हार्ट बीट करता है या धड़कता है तो उससे ब्लड हमारे बॉडी के अन्य हिस्सों में फैलता है।

    इससे ब्लड में एक तापमान भी जनरेट होता है और इस तापमान पर हमारा ब्लडप्रेशर 120 एमएम होनी चाहिए। हम आमतौर पर जिस ब्लडप्रेशर को मेजर करते या करवाते हैं उस प्रेशर के अलावा भी एक और ब्लडप्रेशर होता है जिसे सिस्टोलिक प्रेशर कहते हैं।

    हाई ब्लडप्रेशर के लक्षण तो हैं, लेकिन ब्लडप्रेशर नॉर्मल है तो क्या करें?

    • जामा कार्डियोलॉजी में जून में छपी एक स्टडी के मुताबिक, जब सिस्टोलिक ब्लडप्रेशर समान्य से 90 एमएम बढ़ जाता है यानी जब यह 120 एमएम से 210 एमएम तक पहुंच जाता है तो कॉरोनरी आर्टरीज के डैमेज होने का रिस्क भी बढ़ जाता है। कॉरोनरी आर्टरीज हार्ट का वह पार्ट है, जो ऑक्सीजन युक्त ब्लड को हार्ट मसल्स में ट्रांसपोर्ट करता है।
    • इसलिए हमें जब भी जरूरत से ज्यादा ब्लडप्रेशर हाई होने के लक्षण दिखाई दे रहे हों और रीडिंग में हमारा ब्लडप्रेशर नॉर्मल आ रहा हो तो हमें अपने सिस्टोलिक प्रेशर की जांच भी करा लेनी चाहिए। इस अध्ययन में सामने आए नए फैक्ट्स हमें यह बताते हैं कि हमें इन चीजों को और भी गंभीरता से लेने की जरूरत है।
    • जामा में छपी स्टडी के यहां तक कहती है कि ब्लडप्रेशर का लेवल जिसे हम आमतौर पर नॉर्मल मानते हैं वह हाई भी हो सकता है। जो हार्ट से जुड़ी कई समस्याओं की वजह भी बन सकती है। हार्ट एक्सपर्ट्स का मानना है कि गैर औद्योगिक जगहों पर जहां प्रदूषण का स्तर कम होता है वहां के लोगों का सिस्टोलिक ब्लडप्रेशर 90 होता है। ज्यादा से ज्यादा यह 120 तक ही हो सकता है।

    उम्र बढ़ने के साथ हार्ट से जुड़े रिस्क फैक्टर बढ़ जाते हैं

    • अध्ययन कार्डियोलॉजिस्ट के एक्सपर्ट डॉ. सिएमस और प्रोफेसर पी. व्हेलटन के निर्देशन में किया गया था। जिसमें करीब 1 हजार 500 ऐसे मिडल एज महिला और पुरुषों रखा गया था, अध्ययन में पाया गया कि उन्हें हार्ट से जुड़ी कोई समस्या नहीं है।
    • जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती जाती है लोगों में हार्ट से जुड़े रिस्क फैक्टर बढ़ने लगते हैं। इसलिए एक्सपर्ट्स का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ हर तरह की दवाइयों के खाने से होने वाले साइड इफेक्ट कभी-कभी हमारे ब्लडप्रेशर को बढ़ा देते हैं।
    • बढ़ती उम्र में मेडिटेशन, एक्सरसाइज और डाइट पर जरूर फोकस करना चाहिए। एक्सपर्ट्स का मानना है कि उम्र के साथ वजन तो कतई नहीं बढ़ना चाहिए। मोटापे से डाइबिटीज और हाइपरटेंशन होने की संभावना बढ़ जाती है जो बाद में हाई सिस्टोलिक ब्लडप्रेशर जैसी समस्याओं की वजह बन सकता है।

    सिर्फ ब्लडप्रेशर पर ही फोकस नहीं करना है

    • हार्ट एक्सपर्ट डॉ. व्हेलटन के मुताबिक, यह गलत होगा कि हम सिर्फ ब्लडप्रेशर पर ही फोकस करें। उन्होंने कहा कि जिनका ब्लडप्रेशर हाई होता है उनके पास और भी समस्याएं हो सकती हैं। हमें उन्हें भी साथ ही साथ कंट्रोल करने पर फोकस करना होगा।
    • उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि हाई ब्लडप्रेशर वालों का कोलस्ट्रॉल और ग्लूकोज लेवल भी हाई हो सकता है जो हार्ट से जुड़े समस्याओं की वजह बन सकता है। डॉ. व्हेलटन कहते हैं कि सबसे अच्छी रोकथाम यह होगी कि हम ब्लडप्रेशर के अलावा दूसरे रिस्क फैक्टर पर भी ध्यान दें।
    • कॉफी पीते हैं नुकसान और फायदे --

    • कॉफी हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा है। हम अपनी डेली लाइफ में कई बार कॉफी पीते हैं। एक अध्ययन में यह पाया गया है कि आमतौर कॉफी पसंद करने वाले लोग एक दिन में 3 से 5 कप कॉफी पी जाते हैं यानी एक दिन में एक व्यक्ति 400 मिलीग्राम कॉफी पीता है।

      अमेरिकी नेशनल कैंसर स्कूल में रिसर्चर एरिका लॉफ्टफील्ड के मुताबिक, स्टडी के दौरान यह लगातार पाया गया कि कॉफी से मृत्यु का कोई लेना-देना नहीं है। यानी कॉफी ऐसी चीज नहीं है, जिसके नॉर्मल यूज से किसी की जिंदगी खतरे में आ जाए।

      2015 में कॉफी को हेल्दी डाइट का हिस्सा माना गया

      • सालों से लोग यह मानते आए हैं कि कॉफी कैंसर का कारण बन सकती है। लेकिन, 2015 में अमेरिकी एडवाइजरी कमेटी की डाइट को लेकर जारी की गई गाइडलाइन ने कॉफी के बारे में लोगों की सोच को बदल दिया। पहली बार ऐसा हुआ कि इस कमेटी ने कॉफी के नॉर्मल यूज को हेल्दी डाइट का हिस्सा माना।
      • उसके बाद 2017 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने लिखा कि कॉफी का नॉर्मल यूज फायदेमंद ज्यादा है और नुकसानदेह कम। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के लेखकों ने 200 अध्ययनों का रिव्यू करके लिखा कि सामान्य तौर पर कॉफी पीने वालों को हृदय से जुड़े रोग कम होते हैं।
      • डॉक्टर गियुस्पे ग्रॉसो के मुताबिक, एक दिन में तीन से पांच कप कॉफी पीने से टाइप-2 डाइबिटीज का रिस्क कम हो जाता है। कॉफी का सबसे ज्यादा फायदेमंद पक्ष यह है कि इसके इस्तेमाल से शरीर में पॉलीफेनल बन सकता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देता है।

      गर्भवती महिलाओं के लिए ठीक नहीं कॉफी

      • कॉफी को लेकर बहुत सारे लोग एडिक्ट हो जाते हैं, जिसको लेकर हमेशा चिंता जाहिर की जाती रही है। अमेरिकी संस्थाएं कॉफी को लेकर होने वाले नुकसान पर अध्ययन कर रही हैं। अभी तक इसके नुकसान को लेकर जो कुछ भी कहा जाता रहा है, वह बस एक तरह का अनुमान ही होता है। ज्यादा कॉफी पीने से क्या नुकसान है, यह अभी तक भी साफ नहीं हो सका है।
      • जो महिलाएं मां बनने वाली होती हैं, उनके लिए कॉफी नुकसानदेह हो सकती है, यह बात कई अध्ययन में सामने आ चुकी है। कॉफी के इस्तेमाल से शरीर में कैफीन की मात्रा बढ़ जाती है, जो गर्भ में बच्चे के लिए सही नहीं माना जाता।
      • इडनबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर जॉनथन फॉलोफील्ड कहते हैं, “कॉफी से हमें हेल्थ बेनीफिट मिल सकता है, लेकिन मैं इस बात को लेकर अभी पूरी तरह से श्योर नहीं हूं।”

      कहीं आपके कॉफी बनाने का तरीका गलत तो नहीं

      • आप किस तरह की कॉफी बनाते हैं, डार्क या हल्की? कॉफी बीन्स को ग्राइंड करके या नॉर्मल? इन तरीकों से कॉफी के टेस्ट पर फर्क पड़ता है। लेकिन, अमेरिकी नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में सीनियर रिसर्चर नियल फ्रीडमैन कहती हैं कि कॉफी से होने वाले फायदों पर भी फर्क पड़ता है। कितना फर्क पड़ता है, अभी इस पर अध्ययन जारी ही है।
      • एक्सपर्ट नियल फ्रीडमैन उदाहरण देते हुए बताती हैं कि बहुत से लोग कॉफी बीन्स को रोस्ट करके कॉफी बनाते हैं, जो कॉफी से क्लोरोजेनिक एसिड की मात्रा को कम कर देता है। एस्प्रेसो कॉफी में पानी का बहुत कम इस्तेमाल किया जाता है, जिससे उसमें कॉफी के कंपाउंड्स की मात्रा बहुत ज्यादा होती है।
      • जामा इंटर्नल मेडिसिन ने ब्रिटेन में 5 लाख लोगों की कॉफी हैबिट पर किए गए अध्ययन में पाया कि सभी तरीकों से कॉफी बनाकर पीने से लोगों में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ा, लेकिन तेजी से कॉफी बनाकर पीने (क्विक कॉफी) से लोगों में ज्यादा एसिड बनता दिखा। जामा इंटर्नल मेडिसिन में असिस्टेंट प्रोफेसर सी. कोर्नेलिस के मुताबिक, अलग-अलग तरीकों से कॉफी बना कर पीने से कोलेस्ट्रॉल लेवल ऊपर-नीचे हो सकता है।


आतंकी, मां की अपील नहीं माना  तो सुरक्षाबलों ने उसे लगा दिया

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