DATE 25 DEC 2025
क्या हरिद्वार में गढ़वाली अस्तित्व खतरे में है?
हर की पौड़ी और गंगा घाटों पर बाहरी वर्चस्व से सहमी 'देवभूमि' की पहचानहरिद्वार: जिसे सदियों से 'देवभूमि' उत्तराखंड का प्रवेश द्वार और गढ़वाल का गौरव माना जाता रहा है, आज अपनी ही पहचान को लेकर संघर्ष कर रहा है।एक बड़ा सवाल जो आज हर स्थानीय निवासी के मन में उठ रहा है—क्या हरिद्वार अब वास्तव में गढ़वालियों का है?
हर की पौड़ी: आस्था का केंद्र या बाहरी एकाधिकार?
हर की पौड़ी, जो विश्व भर में गंगा आरती और आस्था का केंद्र है, वहां की जमीनी हकीकत तेजी से बदल रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि घाटों पर अब स्थानीय पंडा-पुरोहितों और छोटे व्यापारियों की जगह बाहरी राज्यों से आए लोगों ने ले ली है।
"आप हर की पौड़ी जाएं या किसी भी प्रमुख गंगा घाट पर, आपको वहां 'गढ़वाली' या 'पहाड़ी' लहजे की जगह अन्य राज्यों की बोलियां और व्यवहार हावी मिलेंगे। पूजा-पाठ की सामग्री बेचने से लेकर घाटों के प्रबंधन तक, हर जगह बाहरी लोगों का 'कब्जा' दिखाई दे रहा है।"
बदलती जनसांख्यिकी (Demographics) और लुप्त होती संस्कृति
हरिद्वार सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति का आधार था।
व्यापार पर एकाधिकार: रिक्शा चलाने वाले से लेकर बड़े होटलों और धर्मशालाओं के संचालन तक, स्थानीय गढ़वाली युवा हाशिए पर है, जबकि बाहरी लोग (विशेषकर पड़ोसी राज्यों से) व्यापार पर हावी हो चुके हैं।
भाषा का लोप: हरिद्वार के बाजारों में अब गढ़वाली भाषा सुनना दुर्लभ हो गया है। नई पीढ़ी और बाहर से आए भारी हुजूम के बीच स्थानीय बोली दब कर रह गई है।
भीड़ का दबाव: अनियंत्रित प्रवासन (Migration) ने शहर के संसाधनों पर भारी दबाव डाला है, जिससे मूल निवासियों के लिए अपने ही शहर में रहना मुश्किल हो गया है।
स्थानीय लोगों की चिंता
स्थानीय निवासियों का दर्द यह है कि वे अपने ही घर में बेगाने होते जा रहे हैं। उनका कहना है कि 'चार धाम' यात्रा का मुख्य पड़ाव होने के बावजूद, यहां के कल्चर में अब पहाड़ की झलक नहीं दिखती। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक अतिक्रमण (Cultural Encroachment) है।
निनिष्कर्षष्कर्ष: वक्त रहते जागने की जरूरत
विकास और पर्यटन जरूरी है, लेकिन यह स्थानीय पहचान की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यदि हर की पौड़ी और गंगा घाटों से गढ़वाली संस्कृति और स्थानीय लोगों का अस्तित्व इसी तरह मिटता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब हरिद्वार सिर्फ एक भीड़भाड़ वाला महानगर बनकर रह जाएगा और अपनी 'देवभूमि' वाली आत्मा खो देगा।
सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्थानीय लोगों के अधिकारों और उनकी संस्कृति को संरक्षण मिले, ताकि गंगा के घाटों पर फिर से वही अपनापन महसूस हो सके।
FORCE TODAY NEWS REPORT HARIDWAR UTTRAKHAND
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